Kanakadhara Stotram PDF in Hindi | कनकधारा स्तोत्र

नमस्कार दोस्तो, आज हम इस पोस्ट में kanakadhara stotram pdf in hindi के बारे मे देखेंगे, इस पोस्ट में आप को इस स्त्रोत के pdf को download करने के लिए मिलने जाएंगा। कनकधारा स्तोत्र इन हिंदी पीडीएफ के साथ ही आप इस स्तोत्र को अर्थ सहित जान पाएंगे, इसमें आप को इस स्त्रोत के Lyrics भी दिए गए है। जिसे आप नीचे जाकर पढ़ सकते है। इस स्त्रोत के पाठ के फायदे और लाभ अतः इसके चमत्कार के बारे में भी बताया गया है।

Kanakadhara Stotram In Hindi / कनकधारा स्तोत्र

कनकधारा स्त्रोत जो की आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित है। उन्होंने ही सर्वप्रथम माँ लक्ष्मी जी की स्तुति की थी। और उनकी स्तुति से ही स्वर्ण बारिश हुई थी। (kanakadhara stotram pdf download) एक बार शंकराचार्य जी भिक्षा मांगते मांगते जंगल में पहुंचे वहां पर उन्हें एक बूढ़ी औरत मिली, तो उन्होंने उनसे भिक्षा की याचना की। जब शंकाराचार्य जी ने भिक्षा की याचना की तो वे बूढी महिला काफी परेशान हो गए। क्योंकि उनके घर में कुछ भी नहीं था जो इन्हें भिक्षा के रूप में वह दे सके। वह काफी परेशान हो गई।

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इसके बाद उन्होंने अपने घर को तलाशा घर में कुछ भी नहीं था। जिससे वह भिक्षा के रूप में शंकराचार्य जी को दे सके, फिर काफी देर तक देखने के बाद घर में उन्हें सुखा आंवले मिला। वही सूखा आंवला ले जा करके उन्होंने भिक्षा के तौर में शंकाराचार्य जी को दिया। इससे शंकाराचार्य जी बहुत दुखी हुए। और उन्होंने सोचा कि इस माता की गरीबी कैसे दूर किया जाए। इससे वे बहुत द्रविन्भुत हो गया बहुत दुखी हुए कि इतनी गरीबी है यह लोग कैसे अपना जिनका (जीवन) चला रहे होंगे।

इसके बाद उन्होंने मां लक्ष्मी की बहुत करुण स्वर में बहुत आर्द स्वर में मां की भक्ति करने लगे। उनकी स्तुति करने लगे जो कि कनकधारा स्त्रोत आज हम जिसको पड़ते व सुनते है। शंकाराचार्य जी ने इसका पाठ इतनी करुण भाव से, इतने प्रेम से मां की स्तुति की थी कि मां प्रसन्न हो कर वहा प्रकट हो गई। शंकाराचार्य जी का कनकधारा स्त्रोत बोलना और वहा लक्ष्मी जी का प्रकट होना बहुत ही आश्चर्य की बात थी। (कनकधारा स्तोत्र हिंदी पीडीएफ) शंकाराचार्य में लक्ष्मी मां से कहा माता कृपया आप इन माता के यह विराजे और उन पर कृपा करे।

माता ने कहा की वह बूढ़ी महिला में अपने पिछले जन्म में कोई पुण्य का काम नही किया था। इस वजह से में यह विराज मान नहीं हो सकती हू। शंकाराचार्य जी ने कहा माता बलेही उन्होंने अपने पिछले जन्म में कोई पुण्य का काम नही किया होंगा किंतु उन्होंने मुझे आंवला दे कर सारा पुण्य कमा लिया लक्ष्मी मां ने शंकाराचार्य की बाते सुन कर।आसमान से मां ने स्वर्ण आंवले सोने के आंवले के आकार में स्वर्ण वर्ष कराई। माता ने कहा की जो भी इसका पाठ करेंगा उसके जीवन में अन,धन और संपत्ति की कभी कोई कमी नही होंगी। तभी से ही कनकधारा स्त्रोत में प्रसिद्ध हो गया।

कनकधारा स्तोत्र के फायदे और उसके चमत्कार / kanakadhara stotram

पौराणिक मान्यता है कि मां लक्ष्मी जिस घर में विराजमान होती है उस घर में सुख समृद्धि की घर में वर्षा होती है। शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी की अराधना करने से विशेष लाभ होता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने के साथ ही उन्हें लाल पुष्प अर्पित करना चाहिए। लक्ष्मी और नारायण की साथ में पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुखमय रहता है और घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है। इसलिए शुक्रवार को मां लक्ष्मी की प्रतिमा के सामने श्रद्धापूर्वक इसका पाठ जरूर क तोरना चाहिए। 

कनकधारा स्तोत्र के पाठ के अंदर लिखा है की जो व्यक्ति इसका दिन में तीनो समय पाठ करता है, तो वो कुबेर के भाती धनवान होता है। लेकिन तीनो समय इसका पाठ कर नही सकते काफी मुश्किल होता है। इसका पाठ दो बार तो करना ही चाहिए। अगर दो बार नहीं तो एक बार तो जरूर ही करना चाहिए। एक समय भी करने से इसका काफी लाभ मिलेगा। जीवन से गरीबी और दरिद्रता अवश्य दूर हो जाता है। जीवन में इतना धन आता है की जिससे आप अपना पर्याप्त गुजारा कर सके तो इसका पाठ करना अधिक लाभदायक आप चाहें

Kanakadhara Stotram PDF In Hindi Download

Kanakadhara stotram in hind pdf के लिए आपको नीचे एक लिंक दी गई है। जहा से आप इसके pdf को free में download कर सकते हैं। download link पर क्लिक करते ही आप इसे डाउनलोड कर सकते है।

Kanakadhara Stotram Lyrics In Hindi / कनकधारा स्त्रोत हिंदी पाठ

इस पोस्ट में आप को kanakadhara stotram lyrics hindi में भी देने वाले है। इसके lyrics आप को हिंदी में और संस्कृत sanskrit दोनो भाषाओं में मिलेंगी। इसके अलावा आप को ऊपर दी गई लिंक को क्लिक कर के आप lyrics के pdf भी डाउनलोड कर सकते है।

॥ श्री कनकधारा स्तोत्र ॥

अङ्ग हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥1॥


अर्थ – जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल के पेड़ का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ती रहती है तथा जिसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, वह सम्पूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी की कटाक्षलीला मेरे लिए मंगलदायिनी हो।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥ 2॥

अर्थ – जैसे भ्रमरी महान कमलदल पर आती-जाती या मँडराती रहती है, उसी प्रकार जो मुरशत्रु श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बारंबार प्रेमपूर्वक जाती और लज्जा के कारण लौट आती है, वह समुद्रकन्या लक्ष्मी की मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन-सम्पत्ति प्रदान करे।


विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष –
मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध –
मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥3॥

अर्थ – जो सम्पूर्ण देवताओं के अधिपति इन्द्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मुरारि श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनन्द प्रदान करनेवाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, वह लक्ष्मीजी के अधखुले नयनों की दृष्टि क्षणभर के लिए मुझपर भी थोड़ी सी अवश्य पड़े।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द –
मानन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥4॥

अर्थ – शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्रीलक्ष्मीजी का वह नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला हो, जिसकी पुतली तथा भौं प्रेमवश हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष नयनों से देखनेवाले आनन्दकन्द श्रीमुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।


बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥5॥

अर्थ – जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि मण्डित वक्षस्थल में इन्द्रनीलमयी हारावली सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करनेवाली है, वह कमलकुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारे –
र्धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्ति –
र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥6॥

अर्थ – जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के समान श्यामसुन्दर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती हैं, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनन्दित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी हैं, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीया मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।

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