18 पुराणों के नाम क्या है? (2022) | 18 Purano Ke Naam

18 पुराणों के नाम क्या है

18 पुराणों के नाम क्या है? तो जानिए 18 puran ke naam in hindi नारद पुराण के अनुसार प्राचीन कल में एक ही पुराण था उप श्लोकों के पुराण का संग्रह किया और उसे 18 भागो में विभाजित हो गया और वहीं 18 भाग पुराण कहलाता है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया गया है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश इन पुराणों के मुख्य देव माने जाते है। त्रिमूर्ति के प्रातेक भगवानों को छ: छ: पुराण समर्पित है। इन पुराणों में अतरिक्त 16 उपपुराण भी समिलित है। इन 18 पुराणों के नाम (18 Puranas name kya hai) इस प्रकार है।

18 पुराणों के नाम क्या है? | Purano Ke Naam Kya Hai

1. ब्रह्म पुराण2. ब्रह्म वैवर्त पुराण
3. विष्णु पुराण4. पद्म पुराण
5. वायु पुराण (शिव पुराण)6. नारद पुराण
7. भागवत पुराण8. मार्कण्डेय पुराण
9. अग्नि पुराण10. भविष्य पुराण
11. ब्रह्माण्ड पुराण12. लिंग पुराण
13. वाराह पुराण14. स्कंद पुराण
15. वामन पुराण16. कूर्म पुराण
17. मत्स्य पुराण18. गरुड़ पुराण

1. ब्रह्म पुराण

18 पुराणों में से एक ब्रह्म पुराण सबसे पहला पुराण माना जाता है। इसके रचयिता भगवान वेदव्यास जी है। पुराण की सारी कथाएं भगवान श्री ब्रह्मा ने बताया है। इस पुराण में कुल 286 अध्याय है। इस पुराण में 14 हजार तक श्लोक पाए गया है। इस पुराण में मूल रूप से श्रृष्टि की उत्पति की कथा, गंगा अवतन की कहानी, राम और कृष्ण  के अवतार की कथा इस पुराण में उल्लेख हुआ है।

2. ब्रह्म वैवर्त पुराण

ब्रह्म वैवर्त पुरण एक विश्नव पुराण है। इस पुराण में भगवान श्री कृष्ण को ही प्रमुख इष्ट मान कर उन्हें श्रृष्टि का कारण बताया गया है। ब्रह्म वैवर्त शब्द का अर्थ है, ब्रह्म की रूपांतर राशि। ब्रह्म की रूपांतर राशि प्राकृतिक है। प्रकुतिक के विविध परिणाम का प्रतिपादन ही इस ब्रह्म पुराण में प्राप्त होता है। भगवान श्री विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण उल्लेख कई सारे पुराणों में हुआ है। किन्तु इस पुराण में यह विषय भिन्नता लिए हुए है। भगवान श्री कृष्ण को ही परभ्रम माना गया है। ब्रह्म पुराण में 4 खंड है। (ब्रह्म खंड,प्राकृतिक खंड, गणपति खंड, श्री कृष्णाजन्म खंड)

ब्रह्म खंड

ब्रह्म खंड में कृष्ण चरित की विविध लीलाओं और शृष्टी कर्म का वर्णन प्राप्त होता है। भगवान श्री कृष्ण के शरीर से ही सभी देवी देवाओं का अभिर भाव माना गया है।

प्राकृतिक खंड

प्राकृतिक खंड में समस्त देवायो की शक्तियों  तथा चरित्रों का सुंदर विवरण किया गया है। इस खंड का प्रारम्भ पांच देवि रुपा प्राकृतिक के वर्णन से होता है।

गणपति खंड

गणपति खंड में गणपति जन्म का विवरण किया गया है। इसमें गणेश जी के चरित्र तथा लीलाओं का अनुसरण किया गया है।

श्री कृष्णाजन्म खंड

श्री कृष्ण जन्म 101 अध्याय में फैला हुआ सबसे बड़ा खंड है। इसमें श्री कृष्ण के जन्म एवं लीलाओं का विस्तृत पूर्वक वर्णन किया है।

3. विष्णु पुराण

यह पुराण 18 पुराणों में से एक है। यह पुराण अन्य पुराणों के अपेक्षा छोटा है। इसमें 7000 श्लोक पाए जाते है। इसकी पुराण रचना महेश विशिष्ट पुत्र और वेदव्यास के पिता पराशाल ऋषि ने किया है। इस पुराण में भगवान विष्णु और उनकी भक्तों के बारेमे वर्णन किया है जिसमें बहुत की रोचक कथाएं है। इस पुराणों मे भगवान विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलेगा जिसमें श्री कृष्ण कथा और राम कथा का अनुसरण हुआ है।

(18 पुराणों के नाम) इस पुराण के छः आध्याय है प्रथम में श्रृष्टि के उत्पत्ति के स्वरूप, कालके स्वरूप तथा पारहाद के बारे में रोचक कथाएं है। दूसरे अध्याय में सभी लोको का स्वरूप उल्लेखन और प्रथ्वी के 9 खंडों के साथ ही नक्षत्रों के बारे में बताया गया है। तीसरे में क़ाल, मन्वन्तर,वेद, शाखाओं का विस्तार, गृहस्थो,धर्म और श्रृद विधि का विस्तार पूर्वक चित्रण मिलेगा। चतुर अध्याय में शौरवंश,चंद्रवंश के वनश्वलियो का वर्णन किया गया है। पंचम श्री कृष्ण और उनकी लीलाओं का संचरण किया गया है और छ: अध्याय में मोक्ष व प्रलय का ज्ञान मिलेगा

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4. पद्म पुराण

पद्मा पुराण अठारह धार्मिक प्रसिद्ध पुराणों में से एक है। यह पुराण सब से बड़े पुराण स्कंद पुराण से छोटा व अन्य पुराणों में से बड़ा है। अर्थात यह दूसरा सबसे बड़ा पुराण है। इसमें उपव्याख्या और कथनो को ज्यादा महत्व दिया गया है। इसमें  पुराने राजा महारजाओं और महापुरूषों के बारे में बताया गया है। अन्य पुराणों द्वारा जिन कथाओं का वर्णन मिलता है उन्हीं कथाओं का वर्णन यहा अलग शब्दों में मिलता है

पद्मा पुराण मतलब वैष्णु पुराण। यह मुख्य रूप से वैष्णो पुराण ही है। इस पुराण में वैष्णो पुराण का भी वर्णन मिलता है। इस पुराण में भगवान विष्णु को ब्रह्म और महेष सर्वोच्च बताया गया है पद्मा पुराण को पांच खंदो में विभाजित किया गया है। इसमें सृष्टि खंड, भूमि खंड और उसके बाद स्वर्ग खण्ड महत्त्वपूर्ण अध्याय है। फिर ब्रह्म खण्ड और उत्तर खण्ड के साथ क्रिया योग सार भी दिया गया है।

5. वायु पुराण (शिव पुराण)

वायु पुराणों को शिव पुराण भी कहा जाता है। शिव पुराण प्राचीन ग्रंथो में से एक है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है । ऐसी मान्यता है कि इसकी व्याख्या खुद भगवान शिव ने की है। मूल महाशिव पुराण में एक लाख श्लोख और 12 खंड थे। लेकिन जब इससे वेदव्यास जी ने लिखा तब इन्होंने इससे संसिप्त कर दिया था, और अब शवी पुराण में 24 हजार श्लोकों है और 7 खंडों में बता गया है (विघेश्वर संहिता, रुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, सतरुद्र संहिता, उमा  संहिता, कैलास संहिता, वायु संहिता)

हिन्दू धर्म के सभी 18 पुराणों में सर्वाधिक मह्त्वपूर्ण शिवपुराण (वायु पुराण) माना जाता है। इसमें शिव के वैविध्य रूपी एवं उनके सब अवतको का विस्तृत संसलान किया है। शिव पुराणों को सभी पुराणों के माथे का तिलक माना जाता है।  शिव पुराण को सुनने से मनुष्य के सभी पापो का नाश हो जाता है। क्योंकि शिव को पाप विमशक भी कहा जाता है। शिव पुराण में शिव के महिमा का प्रचार प्रसार किया गया है।

6. नारद पुराण [18 पुराणों के नाम क्या है]

इस पुराण के अनुसार हम जानेंगे की पुराणों की संख्या कितनी है? Purano ki sankhya kitni hain नारद पुराण एक वैसनव पुराण माना जाता है। इस पुराण के विषय में कहा जाता है कि इस पुराण का पाठ कर पापी व्यक्ति भी पाप मोक्ष की प्राप्ति हो जाते है। इसमें पापियों का उल्लेख कर ते हुए यह कहा गया है कि जो व्यक्ति ब्रह्म हत्या का दोषी है, मदिरा का पान करता है, मांस का सेवन करता है, लहसुन प्याज खाता है तथा चोरी करता है। वह पापी के श्रेणी में आता है। (18 पुराणों के नाम)

नारद पुराण से ही हमें पुराणों कि संख्या प्राप्त हुई है। इस पुराण का प्रतिपदन विषय विष्णु भक्ति है। इस पुराण में श्लोकों की संख्या 25 हजार मनी गई है। इन 25 हजार श्लोकों मेरे से 18110 श्लोकों उपलब्ध है। और बाकी के सारे श्लोक विलुप्त हो गए है।

इस पुराण में वर्त महात्मा, तिर्त महात्मा के विषय में विशेष निरूपण है। यह पुराण 12 वी सदी के आस पास का माना जाता है। इस पुराण को 2 भागो में विभक्त किया गया है (पूर्व भाग और उत्तर भाग)

7. भागवत पुराण

भागवत पुराण इस कलि काल में सभी वेद पुराण हिन्दू धर्म का सर्वाधिक आदरणीय पुराण कहा जाता है। सैकड़ों वर्षों श्रीमद्भागवत कथा हिन्दू समाज की,धार्मिक, समाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा है। यह भी पढ़िए Bhagwat Geeta Shlok With Hindi Meaning

भागवत पुराण वैष्णव संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है। इस पुराण में वेदों,उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गुण और रहस्य माई विषयों का विस्तृत वर्णन किया है। ज्ञान,भक्ति और वैराग्य का ये महान ग्रंथ है।

भागवत पुराण में कुल 12 स्कंद है। जिसमें भगवान श्री विष्णु के अवतार का ही विस्तार पूर्वक वर्णन किया है। इस पुराण में 12 हराज श्लोक मौजुद है। और इस पुराण 335 अध्याय है। अतः इस पुराण 2 अध्याय शामिल है 

(प्रथम स्कन्ध, द्वितीय स्कन्ध, तृतीय स्कन्ध,चतुर्थ स्कन्ध, पञ्चम स्कन्ध, षष्टम स्कन्ध,सप्तम स्कन्ध,अष्टम स्कन्ध नवम स्कन्ध, दशम स्कन्ध, एकादश स्कन्ध,एकादश स्कन्ध,द्वादश स्कन्ध) यह सभी भागवत पुराण के 12 स्कंध है।

8. मार्कण्डेय पुराण

मार्कण्डेय पुराण आकर में छोटा है। इसमें 136 अध्याय होते है। इसके 136 अध्याय में लग भग 9 हजार श्लोक है। मार्कण्डेय ऋष द्वारा इसके कथन से इसका नाम मार्कण्डेय पुराण पड़ा।

यह पुराण वस्तुत: दुर्गा चरित्र एवं वर्णन के लिए प्रसिद्ध है। इससे सैप्त संप्रदाय का पुराण भी कहा जाता है। पुराणों के सभी लक्षणों को यह अपने भीतर समेटे हुए है। इसमें ऋषि मार्कण्डय ने मानव कल्याण हेतु सभी प्रकार के नैतिक, सामाजिक, अध्यात्मिक संप्रदाय का प्रतिपादन किया है। इसमें में भारत वर्ष का विस्तृत स्वरूप और सौंदर्य के साथ प्रकट किया है।

इस पुराण में शरीर विज्ञान का भी सुंदर विवरण करते हुए सरल भाषा का इस्तेमाल किया गया है। वेदों के अनुसार इस पुराण के पाठ करने हेतु पवित्र स्थान होना महत्वपर्ण माना गया है। इस पुराणों में यह भी बताया गया है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए अपने भीतर ओम क़ार अर्थात योग साधना पर जोर दिया गया है । इस पुराण में आत्मत्याग और आत्मप्रप्ती को सर्वश्रेष्ठ माना

9. अग्नि पुराण [18 पुराणों के नाम क्या है]

अग्नि पुराण को ज्ञान कोश भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें बहुत सारे सार मौजुद है। कुछ लोग इससे ज्ञान कोश भी कहते है तो कुछ लोग इससे पुराण कोश भी कहते है। इसमें वक्ता भगवान अग्नि है। माना जाता है कि अग्नि देव ने है ये सारी कथा सारे श्लोक महर्षि वेदव्यास जी को स्वयं सुनाया गया था

माना जाता है कि जो 18 पुराण है। वे सब ही भगवान के 18  अंग है ये सब बेटे पद्म पुराण में भी उल्लेखित है अतः अग्नि पुराण को भगवान का बायां माना गया है। नारद पुराण के अनुसार इस पुराण में कुल 15 हजार श्लोक है। परन्तु अभी के समय में 11475 ही उपलब्ध है।और ये सब 383 अध्याय में प्रस्तुत है।

अग्नि पुराण’ ने मन की गति को ब्रह्म में लीन होना ही ‘योग’ माना है। जीवन का अन्तिम लक्ष्य आत्मा और परमात्मा का संयोग ही होना चाहिए। इसी प्रकार वर्णाश्रम धर्म की व्याख्या भी इस पुराण में बहुत अच्छी तरह की गई है। ब्रह्मचारी को हिंसा और निन्दा से दूर रहना चाहिए। गृहस्थाश्रम के सहारे ही अन्य तीन आश्रम अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। इसलिए गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों में श्रेष्ठ है। वर्ण की दृष्टि से किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। वर्ण कर्म से बने हैं, जन्म से नहीं।

10. भविष्य पुराण

भविष्य पुराण 18 पुराणों में से एक है। जो भविष्मे होने वाली घटना कब वर्णन करता है। भविष्य पुराण में कई सारे बातो का वर्वन हुआ है और हमारे हर प्रश्न का उत्तर मिला है।भविष्य पुराणों में ऐसी कई सारी बाते लिखी है जिसे जन कर रोंगटे खड़े हो जाते है। इस पुराण में 214 अध्याय में है

भविष्य पुराण के अनुसार इस पुराण में 50 हजार श्लोक होने चाहिए किन्तु इसमें 28 हजार ही श्लोक मौजुद है। भविष्य पुराण और भविष्य उतल पुराण दोनों के श्लोकों की संख्या मिला कर ये सम्पूर्ण पुराण बना है। भविष्य पुराण एक सूर्य प्रदान ग्रंथ है। इसके अधिस्त्रत देव सूर्य देव है। इस पुराण के अनुसार सूर्य देव को सुबह दोपहर शाम को जल चड़ाना चाहिए।

ज्यादातर पुराणों में शिव विष्णु और भ्रह्म के बारे में बताया गया है। किन्तु इस पुराण में सूर्य देव के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें सूर्यनारायण को जगत का पालन करने वाले,जगत के विनाश करने वाले ,जगत का संहार करने वाले पूर्ण ब्रह्म बताया गया है। इसमें भगवान सूर्य के स्वरूप,उनकी महिमा,उनकी पूजा विधि,सूर्य नम्कार,आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है भविष्य पुराण 4 पर्व में विभाजित है(ब्रह्म पर्व, मध्यम पर्व, प्रतिसर्ग पर्व तथा उत्तर पर्व) यह सभी भविष्य पुराण  में 4 पर्व है।

11. ब्रह्माण्ड पुराण

ब्रह्माण्ड पुराण सबसे आखरी पुराण माना जाता है। सबसे आखरी पुराण भी होते हुए ये पुराण सबसे महत्व पूर्ण माना कहा गया है। ब्रह्माण्ड पुराण में पूरे ब्रह्माण्ड का ज्ञान है। इसीलिए इस का नाम ब्रह्माण्ड पुराण पड़ा। यह पुराण वैज्ञानिक दृष्टि से यह पुराण का विशेष महत्व है।

विद्वानों के दृष्टि से यह पुराण वेदों में सामान माना गया है। छंद शास्त्र के अनुसार भी यह पुराण उच्य कोटि का माना जाता है यह पुराण तीन भागो में विभक्त है पूर्व, मध्य और उत्तर इन भागो में विभक्त है में है। इस्पुरण में 12 हजार श्लोक है और 156 अध्याय है।

पूर्वभाग

पूर्व भाग के प्रक्रिया पाद में पहले कर्तव्य का उपदेश नैमिषा आख्यान हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति और लोकरचना इत्यादि विषय वर्णित है, द्वितीयभाग में कल्प तथा मन्वन्तर का वर्णन  है।

इस भाग में समुद्र मंथन, विष्णु द्वारा लिंगोत्पत्ति आख्यान, मन्त्रों के विविध भेद, वेद की शाखाएं और मन्वन्तरोपाख्यान का उल्लेख भी किया गया है।

मध्यभाग 

मध्यभाग के सप्तऋषियों का वर्णन प्रजापति वंश का निरूपण उससे देवता आदि की उत्पत्ति इसके बाद विजय अभिलाषा और मरुद्गणों की उत्पत्ति का कथन है।

मध्य भाग में श्राद्ध और पिण्ड दान सम्बन्धी विषयों का विस्तार के साथ वर्णन है। साथ ही परशुराम चरित्र की विस्तृत कथा, राजा सगर की वंश परम्परा, भगीरथ द्वारा गंगा की उपासना,आदि का वर्णन प्राप्त हुआ है।

उत्तर भाग

उत्तर भाग में भावी मन्वन्तरों का विवेचन, त्रिपुर सुन्दरी के प्रसिद्ध आख्यान जिसे ‘ललितोपाख्यान’ कहा जाता है, का वर्णन, भंडासुर उद्भव कथा और उसके वंश के विनाश का वृत्तान्त आदि हैं।

12. लिंग पुराण [18 Purano Ke Naam]

देवादी देव भगवान शंकर से युक्त यह पुराण 18 पुराणों में सब से विशिष्ट स्थान प्राप्त करता है। इसमें भूत भावन परम कृपालु शंकर जी के जोतिर लिंक के उद्भव की परम पावन कथाएं है। इसमें इशन कल्प का वृतान, सम्पूर्ण सर्ग विसर्ग आदि दस लक्षणों से युक्त लोक कल्याण के लिए कहा गया है

18 पुराणों की संख्या करते समय नारद पुराण के आनूसार यह ज्ञार्वाह महापुराण है। नारद पुराण के अध्याय 102 में लिंग पुराण की विशिष्ट सूची दी गई है। नारद पुराण के अनुसार यह पुराण धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष,चारुपदार्थो को देने वाले है। यह पड़ने व सुनने वालों को भक्ति व मुक्ति प्रदान करता है। भगवान शिव के महत्तम को बताने वाले इसमें 11 हजार श्लोक है यह सभी पुराणों में सबसे उत्तम माना गया है। भगवान वेद व्यास से रचित इस पुराण में पहले योग का आख्यान फिर कल्प का आख्यान है। इसके बाद लिंग का प्रधुर भाव और उसकी पूजा बताई गई है।

इस पुराण में लिंग शब्द का अर्थ होता है चिन्ह या फिर प्रतीक माना गया है।शैव सिद्धान्तों का अत्यन्त सरल, सहज, व्यापक और विस्तृत वर्णन जैसा इस पुराण में किया गया है, वैसा किसी अन्य पुराण में नहीं है। इस पुराण में कुल एक सौ तिरसठ अध्याय हैं। पूर्वार्द्ध में एक सौ आठ और उत्तरार्द्ध में पचपन अध्याय हैं। इसमें शिव के अव्यक्त ब्रह्मरूप का विवेचन करते हुए उनसे ही सृष्टि का उद्भव बताया गया है।

13. वाराह पुराण

वाराह पुराण एक वैष्णो पुराण है। विष्णु जी के अनेकों अवतारों में से एक अवतार था विष्णुजी का। प्रथ्वी का उद्धार कर ने के लिए भगवान श्री विष्णु ने यह अवतार लिया था। इस पुराण की विस्तृत जानकारी इस पुराण में है। इस पुराण में 270 अध्याय है। और लगभग 10 हजार श्लोक है। इन श्लोकों में भगवान वाराह के धर्मो वेस कथोंके रूप के प्रस्तुत किया गए है।वाराह पुराण एक योजना बद्ध  रूप से लिख गया पुराण है।

पुराणों के सभी आनिवरी लक्षण इस पुराण में देख गए है। मुख्य रूप तीर्थो के सभी महात्म्य और पिंडों पुजारियों को अधिक से अधिक दान दक्षिण देने के पुण्य का प्रचार किया है। विष्णु पुराण का अनुष्ठान की शिक्षा विधि पूर्वक दी गई है। इस पुराण में व्रतो के बारे में भी विस्तृत जानकारी दी गई है। इस पुराण में महिषासुर वद्ध की कथा भी दी गई है। कहा जाता है कि यह पुराण दो भागो में विभक्त हैं पूर्वभाग और उत्तर भाग ।

इसमें भगवान श्रीहरिके वराह अवतार की मुख्य कथा के साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ-यजन, श्राद्ध-तर्पण, दान और अनुष्ठान आदि का शिक्षाप्रद और आत्मकल्याणकारी वर्णन है। पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के द्वारा निर्मित जो मानवकल्प का प्रसंग है उसी को विद्वानों में श्रेष्ठ वेदव्यास जी ने इस पुराण में लिपिबद्ध किया है। यह पुराण सर्वप्रथम भगवान् वराह ने पृथ्वी को सुनाया था, इसी कारण इसे ‘वराह पुराण’ कहा जाता है। वस्तुत भगवान् विष्णु ने ही पृथ्वी के उद्धार के लिए वराहावतार धारण किया था। इस अवतार में भगवान् वराह ने हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने का वध कर पृथ्वी को एक सहस्र वर्ष तक अपने विशालमुख पर धारण किया था।

14. स्कंद पुराण

स्कंद पुराण एक महापुराण माना जाता है। यह पुराणों कि संख्या में 13 वे स्थान पर आता है। इस पुराण का नाम भगवान शिव के पुत्र कार्तिक के नाम पर रखा गया है। कार्तिक का ही नाम स्कंद है। इसके हर एक खंड को अलग अलग विद्वानों द्वारा बताया गया है। इस पुराणों में 12 जोतीर लिंको के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इस पुराण में घराहस्त जीवन के बारे में बताया गया है। इस पुराण के आनू सार जिस व्यक्ति के पास धन, स्त्री,पुत्र,घर, धर्म के काम, खेत ये सभी 5 चीज जिस भी व्यक्ति के पास होते है। उसी व्यक्ति का जीवन सफल माना गया है।

यह सैय संप्रदाय का पुराण कहा जाता है। इस पुराण में शिव पुत्र स्कंद के द्वारा तारकासुर के वाद्ध का विस्तृत पूर्वक वर्णन किया गया है। और समुद्र मंथन की कथा भी इस पुराण में विसतृत है। कहते है कि इस पुराणों जो भी सुन लेता है उससे आरोग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। लक्ष्मी जी उन के यह वास करती है। और साथ ही विष्णु जी की भी असीम कृपा प्राप्त होती है।

स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत के महामात्य का वर्णन मिलता है। इस व्रत को करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। इसमें एक विधवा ब्राह्मणी और शांडिल्य ऋषि की कथा के माध्यम से इस व्रत की महिमा का वर्णन मिलेगा। संक्षिप्त स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड-कार्तिकमास-माहात्म्य के अनुसार ब्रम्हाजी कहते हैं कि इस पृथ्वी पर श्रद्धा एवं मेधा ये दो वस्तुएं ऐसी हैं जो काम, क्रोध आदि का नाश करती हैं। इस पुराण में कुल सात खंड है।(काशीखंड, महेश्वर खंड, रेवाखंड, अवन्तिका खण्ड, प्रभास खण्ड, ब्रह्म खण्ड और वैष्णव खण्ड)

पुराणकार द्वारा व्यक्त की गई यह सद्भावना अति सुन्दर और स्तुति करने योग्य है। अधिकांश पुराणों में ‘बुद्धावतार’ का नाम देने के अतिरिक्त उनकी कोई भी चर्चा नहीं की गई है। परन्तु ‘स्कन्द पुराण’ में उनका ‘माया-मोह’ के नाम से विस्तृत वर्णन किया गया है।

15. वामन पुराण [18 Purano Ke Naam kya Hai?]

यह पुराण 18 पुराणों में से एक है। जो भगवान शिव को समर्पित है। कई लोग इस विष्णु पुराण भी कहते है क्योकी इसमें विष्णुजी के अवतार श्री वामन भगवान् का उल्लेख किया है। परन्तु यह यहां पुराण शिव पुराण ही है। इस पुराण में वामन भगवा के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। इसलिए इस पुराण का नाम वामन पुराण पड़ा है। इस पुराण में 10 हजार श्लोक है। परन्तु वास्तव में अभी 6 हजार ही श्लोक मौजुद है।

यह शिव पुरण होते हुए भी इस पुराण में विष्णु भगवान में अवतार के बारे में विस्तार जानकारी दी गई है। इसके पुराणिक कथाएं बाकी पुराणिक कथो से अलग है। इस पुराण में कई सारी कथाएं बहुत ही अलग ढंग से बताया गया है। जैसे शिवलिंग कथाएं, शिव सती कथाएं, तारकासुर की कथाएं आती का वर्णन इस पुराणों अलग ढंग से बताया गया है। ब्रह्माजी द्वारा कहा हुआ उत्तम स्तोत्र तथा प्रहलाद और बलि के संवाद के सुतल लोक में श्रीहरि की प्रशंसा का उल्लेख है। इस पुराण में तीर्थों का वर्णन बहुत ही संशेप्त में दिया गया है। इस पुराण की एक खास बात और है कि इस पुराण में रक्षश राजाओं के बारे में बताया गया है। जिन रक्षशो का इस पुराण में वर्णन हुआ है वे संकरी,शुशोभित,कलाप्रेमी और संस्कारी है। इस पुराण के दो खंड है पुर्व खंड, उत्तर खंड है।पुर्व पुराण के  बारे में विस्तृत जानकरी दी है। पर इसके द्वितीय खंड उत्तर खंड के बारे में कोई जानकारी है प्राप्त हो पाई है। [18 Purano Ke Naam]

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पूर्व भाग: वामन पुराण के पूर्व भाग में ब्रह्मा जी की कथा के साथ भगवान हरी की काल रूप संज्ञा, कामदेव दहन, प्रह्लाद एवं नर-नारायण का युद्ध, काम्यव्रत व अन्य कथाओं का वर्णन किया गया है।

उत्तर भाग: इस पबग के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह पुराण प्राप्त नहीं होने के कारण कोई जानकारी नहीं है।

16. कूर्म पुराण [18 पुराणों के नाम क्या है?]

18 पुराणों में से एक कूर्म पुराण भी है। यह पुराण संख्या में 15 वे स्थान में आता है। यह पुराण समुद्र मंथन की कथा आधारित है। समुद्र मंथन का सार उल्लख विस्तृत पूर्वक वर्णन किया है। पवित्र ‘कूर्म पुराण’ ब्रह्म वर्ग के अंतर्गत आता है।

इस पुराण में चारों वेदों का श्रेष्ठ सार निहित है। समुद्र मंथन के समय मंदराचलगिरि को समुद्र में स्थिर रखने के लिए देवताओं की प्रार्थना पर भगवान् विष्णु ने कूर्मावतार धारण किया था। तत्पश्चात उन्होंने अपने कूर्मावतार में राजा इन्द्रद्युम्न को ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का गूढ़ रहस्य प्रदान किया था।

इसमें शैव तथा शाक्त मत की भी विस्तृत चर्चा की गई है। इस पुराण में पुराणों में पांचों प्रमुख लक्षणों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर एवं वंशानुचरित का क्रमबद्ध तथा विस्तृत विवेचन किया गया है। इस पुराण में 4 सहित है। (ब्राह्मी संहिता,भगवती सहित, शैरी संहिता, वैष्णवी संहिता)

इन सभी सहिताओ में से केवल एक ही संहिता उपलब्ध है।ब्राह्मी सहित बाकी के तीन भगवती सहित, शैरी संहिता, वैष्णवी संहिता अभी के समय में उपलब्ध नहीं है।

17. मत्स्य पुराण

मत्स्य पुराण 18 में से एक है। यह पुराण की संख्या 16 बताई गई है। इस पुराण में भगवान श्री विष्णु के प्रथम रूप के बरेमे बताया गया है। मत्स्य का मतलब होता है मछली । [18 Purano Ke Naam] इस पुराण में 14 हजार श्लोक है। तथा 291 अध्याय है। इस पुराण में भगवान विष्णु के अवतार मत्स्य अवतार के बरीम बताया गया है। इसीलिए इस पुराण का नाम मत्स्य puran पड़ा। इस पुराण में सात कल्पो का वर्णन है।

इस पुराण में सारे वंश का वर्णन है। सूर्य वंश, चंद्र वंश, गुरु वंश, यादों वंश ,अग्नि वंश आदि वंश का इस विस्तार पूर्वक उल्लेख किया गया है। इस पुराण में राज धर्म के बारे में भी बताया गया है कि राजा का धर्म क्या है, राजा की शुरक्षा कैसी की जनी चाहिए,युद्ध में क्या ऐतिहात बरत में चाहिए और भी बहुत कुछ इस पुराण में बताया गया है।

इस पुराण में यमराज और सत्यवान कि कथा का भी अच्छे तरह से वर्णन किया गया है और इस पुराण में शगुन अपशगुन,मंगल अमंगल आदि के बारे मे भी बताए गया हैं।इस पुराण में आयुर्वेद चिकित्सा का भी आनूठ चित्रण किया गया है। मूर्तियों में बारे विसतारपूर्वक जानकारी दी गई है। की किस प्रकार मूर्तियां बनाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस पुराण को पड़ने से घर में शुख समृद्ध आती है

इस पुराण को स्वयं श्रीहरि मत्स्य भगवान ने कहा है। यह पुराण परम् पवित्र, आयु की वृद्धि करने वाला, कीर्ति वर्धक, महापापों का नाश करने एवं यश को बढ़ाने वाला है। इस पुराण की एक दिन की भी यदि व्यक्ति कथा सुनने वह भी पापों से मुक्त होकर श्रीमद्नारायण के परम धाम को चला जाता है।

18. गरुड़ पुराण [18 पुराणों के नाम क्या है?]

गरुड़ पुराण प्रसिद्ध वेद पुरानी में से एक है। वैष्णो संप्रद्य से संभतित गरुड़ पुराण हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद संग्रती प्रदान कनेवाला माना जाता है। इसलिए सनातन हिन्दू धर्म में मृत्यु के गरुड़ पुराण का सर्वन करने का प्रावदन है। इस पुराण के आधिसास्त्र भगवान विष्णु है। 18 महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण का अपना एक अलग विशेष महत्व है। क्योंकि इसके देव खुद भगवान श्री विष्णु माने जाते है।

गरुड़ पुराण के अनुसार हमारे कर्मों का फल हमें हमारे जिवान में तो मिलता ही है परन्तु मारने के बाद भी हमारे कर्मो का फल हमें मिलता है। इसीलिए इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए किसी सदस्य के मृत्यु के बाद का अवसर निर्धारित किया गया है। ताकि हम इसका ज्ञान प्राप्त कर सके। [18 Purano Ke Naam] और किस व्यक्ति की मृत्यु हुई है उसके संबंधियों की शंती की प्राप्ति हो सके।

गरुड़ पुराण में भगवान श्री विष्णु का विस्तार पूर्वक उल्लेख हुआ हैं। भगवान श्री विष्णु के 24 अवतार का वर्णन ठीक उसी प्रकार से मिल ता है जिस प्रकार से भागवत पुराण में मिलता है। गरुड़ पुराण में 19 हजार श्लोक है। किन्तु वर्तमान समय में 7 हजार ही श्लोक पाए जाते है। इस पुराण को दो भागों में वभक्त है। पहले भाग में भगवान श्री विष्णु भक्ति और उपासना कवर्नित है। और दूसरे भाग में मृत्यु के बाद का समय का वर्णन हुआ है।

गरुड़ पुराण के नितिसार में कहा गया है कि शत्रुओं से निपटने के लिए सतर्कता और चतुरता सहारा लेना चाहिए। शत्रु लगातार हमें नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते रहते हैं। ऐसे में यदि हम चतुरता नहीं दिखाएंगे तो नुकसान उठाएंगे। इसलिए जैसा शत्रु है, उसके अनुसार नीति का उपयोग करके उसे काबू में रखा जाना चाहिए।

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